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रायगढ़ पुलिस की चुप्पी से बढ़े अडानी गुर्गों के हौसलेपत्रकारों को धमकाने और पूर्व मुख्यमंत्री का रास्ता रोकने वालों पर अब तक कार्रवाई नहींग्रामीणों की आड़ में अडानी समर्थकों की गुंडागर्दी जारी





रायगढ़ पुलिस की चुप्पी से बढ़े अडानी गुर्गों के हौसले

पत्रकारों को धमकाने और पूर्व मुख्यमंत्री का रास्ता रोकने वालों पर अब तक कार्रवाई नहीं

ग्रामीणों की आड़ में अडानी समर्थकों की गुंडागर्दी जारी

रायगढ़, 02 सितम्बर 2025

रायगढ़ जिले में कोयला खनन के नाम पर अडानी समूह की मनमानी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। महाजेंको से एमडीओ समझौते के बाद कंपनी सिर्फ जंगल और जमीन पर कब्ज़ा ही नहीं कर रही, बल्कि यहां के छोटे उद्योगों तक को अपने शिकंजे में लेने की रणनीति बना रही है। कोरबा वेस्ट के विशाल कोयला भंडार पर नज़र रखना कंपनी की पहली चालों में से एक है। यही कारण है कि रायपुर और दिल्ली के दबाव में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह कंपनी के हित में झुका दिखाई देता है।

खनन से प्रभावित ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि बिना अनुमति के कागज़ात तैयार कर जंगलों को काटा जा रहा है। मगर उनकी आवाज़ प्रशासन और सत्ता के शोरगुल में दबकर रह जाती है।

इसी बीच कंपनी से जुड़े लोगों की दबंगई भी खुलकर सामने आ रही है। किसानों की ज़मीन हड़पने, मारपीट करने और उल्टे मुकदमे दर्ज कराने जैसे मामले आम हो चुके हैं। 6 अगस्त को कलेक्ट्रेट परिसर में पत्रकारों से बदसलूकी और उन्हें जान से मारने की धमकी इसका ताज़ा उदाहरण है। पत्रकारों ने तुरंत थाना और एसपी कार्यालय में शिकायत दी, लेकिन 25 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यह स्थिति साफ दिखाती है कि रायगढ़ पुलिस कंपनी के गुर्गों के सामने बेबस या मिलीभगत में है।

याद रहे, यही पुलिस जुलाई माह की शुरुआत में तमनार के मुड़ागांव में अडानी कंपनी को जंगल कटाई में सुरक्षा देने के लिए बड़े पैमाने पर फोर्स लेकर पहुंची थी। पूरा इलाका छावनी में तब्दील कर दिया गया था और ग्रामीणों को जंगल तक जाने नहीं दिया गया। प्रशासन ने तब यह स्पष्ट कर दिया था कि जंगल हर हाल में काटे जाएंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री का रास्ता रोकने वाले वही गुर्गे, जिन्होंने पत्रकारों को धमकाया

मुड़ागांव आंदोलन के दौरान जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ग्रामीणों से मिलने पहुंचे थे, तो उनके काफिले को भी प्रशासन ने रोकने की कोशिश की। सड़क पर गाड़ी खराब होने का बहाना बनाने वाले वही लोग बाद में कलेक्ट्रेट परिसर में पत्रकारों को धमकाते नज़र आए। यही तथाकथित “ग्रामीण” अब अधिकारियों से मिलकर ज़मीन-जंगल छोड़ने का समर्थन करते हुए दिखते हैं।

यह साफ है कि कंपनी ने अपने गुर्गों को ग्रामीणों के भेष में खड़ा कर रखा है, जो हर विरोध को तोड़ने और माहौल बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि प्रभावित 9 पंचायतों के 14 गांवों में भय का माहौल है।

पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है, क्योंकि जल-जंगल-जमीन की कीमत पर अडानी समर्थित गुंडागर्दी को खुला संरक्षण दिया जा रहा है।

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