छत्तीसगढ़ बलरामपुर!मो कौशल ! रामानुजगंज
इमाम हुसैन की याद में लोग घरों में रखते हैं ताजिया, मुस्लिम धर्म में है बड़ा महत्व

मुस्लिम धर्म में मुहर्रम के महीने की शुरूआत के बाद ही नए साल की शुरूआत मानी जाती है. मुहर्रम के महीने का मुस्लिम धर्म में बड़ा ही महत्व है. इस वजह से मुस्लिम धर्म के लोग ताजिए को तैयार करते हैं
मुस्लिम धर्म में मुहर्रम के महीने की शुरुआत होते ही नए साल की शुरुआत हो जाती है. इस महीने में ताजिए का बड़ा महत्व माना जाता है. लोग अपने घरों में अलग-अलग तरह के ताजिए बनवाकर रखते हैं और उनकी जियारत करते हैं, लेकिन मुस्लिम धर्म में इन ताजियों का बड़ा महत्व है, ये ताजिए करबला में हुई जंग की याद दिलाते हैं. इराक के करबला मैदान में इमाम हुसैन और यजीद के बीच हुई लड़ाई में इमाम हुसैन के शहीद होने के बाद उनकी याद में एक अस्ताना बनाया गया.
इसलिए हर साल मुहर्रम के महीने में मुस्लिम धर्म के लोग उनकी याद में ताजिओं को घरों में रखते हैं और दुआएं मांगते हैं. फिर उसके बाद उन्हें करबला में सुपुर्द-ए खाक करते हैं. ये ताजिए लोग अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से तैयार कराते हैं.
अलग-अलग धातुओं से बनाए जाते हैं ताजिए
फिरोजाबाद के रहने वाले मोहम्मद हनीफ खलीफा ने लोकल 18 से बातचीत करते हुए कहा कि इस्लामिक धर्म की नए साल की शुरुआत होने के बाद 10 तारीख को नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों और परिवार के साथ मजहब-ए-इस्लाम को बचाने, हक और इंसाफ को जिंदा रखने के लिए शहीद हो गए थे. इसलिए हर साल लोग मोहर्रम पर पैगंबर-ए-इस्लाम के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में ताजिए रखते हैं.
दरअसल, इराक के करबला में हुई जंग में हजरत इमाम हुसैन की शहादत हर धर्म के लोगों के लिए मिसाल है. क्योंकि यह जंग बताती है कि जुल्म के आगे कभी नहीं झुकना चाहिए. चाहे इसके लिए सिर ही क्यों न कट जाए, लेकिन सच्चाई के लिए बड़े से बड़े जालिम शासक के सामने भी खड़ा हो जाना चाहिए. वहीं, उन्होंने कहा कि मोहर्रम की 9वीं तारीख को लोग अपने-अपने घरों में इन ताजिओं को तैयार करवाते हैं. जिसकी जैसी हैसियत होती है वह उतना बड़ा ताजिया तैयार करवाता है. कुछ लोग सोने और चांदी के ताजिए तैयार करवाते हैं और कुछ लोग कागज और लकड़ीं से इन ताजिओं को बनवाकर रखते हैं.
करबला में करते हैं सुपुर्द- जब करबला में हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार के साथ शहीद हो गए. जिसके बाद उनकी याद में वहां एक अस्ताना तैयार किया गया. आज भी लोग वहां जाकर माथा टेकते हैं और दुआएं मांगते हैं, लेकिन जो लोग वहां नहीं जा सकते वो मुहर्रम के महीने में घर पर ही ताजिए के रुप में बनाकर उन्हें याद करते हैं. मोहर्रम की 9 तरीख को जियारत रखे जाते हैं.

